बिलासपुर, 8 जुलाई। बिलासपुर के बहुचर्चित फर्जी कार्डियोलॉजिस्ट मामले में पुलिस जांच पूरी होने के बाद अपोलो अस्पताल प्रबंधन और उसकी चयन समिति को बड़ी राहत मिली है। पुलिस ने साक्ष्यों के अभाव में उनके खिलाफ न्यायालय के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है। वहीं, फर्जी दस्तावेजों और कथित रूप से गलत पहचान के आधार पर चिकित्सकीय सेवाएं देने के आरोपी डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के खिलाफ पहले ही अभियोग पत्र (चार्जशीट) दाखिल किया जा चुका है और उसके विरुद्ध आपराधिक मुकदमा जारी रहेगा।
शिकायत से शुरू हुई थी जांच
इस मामले की शुरुआत 9 अप्रैल 2025 को हुई, जब डॉ. प्रदीप शुक्ला ने सरकण्डा थाना में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के अनुसार, वर्ष 2006 में उनके पिता स्वर्गीय पंडित राजेन्द्र प्रसाद शुक्ला का उपचार अपोलो अस्पताल, बिलासपुर में हुआ था, जहां आरोपी डॉक्टर ने उनकी एंजियोग्राफी और एंजियोप्लास्टी की थी। उपचार के बाद उनकी मृत्यु हो गई।
शिकायत में आरोप लगाया गया कि संबंधित डॉक्टर योग्य एवं पंजीकृत हृदय रोग विशेषज्ञ नहीं था और अस्पताल प्रबंधन ने आवश्यक दस्तावेजों का सत्यापन किए बिना उसे कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में नियुक्त कर दिया।
कई संस्थानों से जुटाए गए दस्तावेज
विवेचना के दौरान पुलिस ने मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) बिलासपुर, अपोलो अस्पताल, दमोह पुलिस, छत्तीसगढ़ मेडिकल काउंसिल, उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज सहित कई संस्थानों से दस्तावेज और जानकारी एकत्र की।
जांच में पुष्टि हुई कि आरोपी वर्ष 2006 में अपोलो अस्पताल में कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत था। अस्पताल ने उसका बायोडाटा और नियुक्ति आदेश उपलब्ध कराया, लेकिन उसकी शैक्षणिक डिग्रियां और मेडिकल काउंसिल पंजीयन से जुड़े मूल दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा सका।
जांच में सामने आईं गंभीर अनियमितताएं
पुलिस जांच में सामने आया कि आरोपी ने स्वयं को MBBS, MRCP तथा इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी में फेलोशिप धारक बताया था। हालांकि, मेडिकल काउंसिल से प्राप्त जानकारी के अनुसार “नरेन्द्र जॉन कैम” नाम से उसका कोई वैध पंजीयन नहीं मिला।
जांच में यह भी सामने आया कि आरोपी ने कथित रूप से आधार कार्ड, पैन कार्ड सहित अन्य पहचान संबंधी दस्तावेज नरेन्द्र जॉन कैम नाम से तैयार कराए थे। वहीं, उत्तर बंगाल मेडिकल कॉलेज से प्राप्त जानकारी में उसके नाम पर वैध MBBS डिग्री जारी होने का रिकॉर्ड भी उपलब्ध नहीं मिला।
पूछताछ में आरोपी ने क्या स्वीकार किया
दमोह में दर्ज प्रकरण के आधार पर गिरफ्तार किए गए आरोपी को प्रोडक्शन वारंट के जरिए बिलासपुर लाकर पूछताछ की गई।
पूछताछ के दौरान आरोपी ने स्वीकार किया कि वह अपोलो अस्पताल में कंसल्टेंट कार्डियोलॉजिस्ट के रूप में कार्यरत था और उसने कई मरीजों की एंजियोग्राफी तथा एंजियोप्लास्टी की थी। हालांकि, पुलिस द्वारा अवसर दिए जाने के बावजूद वह अपनी विशेषज्ञता से जुड़े वैध दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका। जांच में यह भी सामने आया कि उसने अस्पताल में नियुक्ति नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव नाम से प्राप्त की थी।
27 मरीजों की मौत की जानकारी, लेकिन पर्याप्त साक्ष्य नहीं
विवेचना के दौरान यह जानकारी भी सामने आई कि आरोपी के कार्यकाल में उपचार प्राप्त करने वाले लगभग 27 मरीजों की मृत्यु हुई थी। हालांकि, पुलिस को इन मामलों में पर्याप्त दस्तावेजी साक्ष्य या अन्य पीड़ित परिवारों की शिकायतें प्राप्त नहीं हुईं। केवल दो पीड़ित पक्षों ने औपचारिक शिकायत दर्ज कराई।
उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर पुलिस ने आरोपी के खिलाफ 27 जून 2025 को अभियोग पत्र क्रमांक 671/2025 न्यायालय में प्रस्तुत किया।
अस्पताल प्रबंधन की भूमिका की अलग से हुई जांच
आरोपी के खिलाफ चार्जशीट दाखिल करने के बाद पुलिस ने दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 173(8) के तहत अपोलो अस्पताल प्रबंधन और चयन समिति की भूमिका की अलग से जांच की।
इस दौरान अस्पताल से दोबारा जानकारी मांगी गई, डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार से पूछताछ की गई तथा नियुक्ति से जुड़े उपलब्ध दस्तावेजों का परीक्षण किया गया।
अस्पताल ने रिकॉर्ड उपलब्ध न होने की बात कही
अपोलो अस्पताल प्रबंधन ने पुलिस को लिखित जवाब में बताया कि संबंधित नियुक्ति 17 से 18 वर्ष पुरानी है। उस समय रिकॉर्ड केवल हार्ड कॉपी में सुरक्षित रखे जाते थे। निर्धारित रिकॉर्ड संरक्षण अवधि समाप्त होने के कारण संबंधित दस्तावेज अब उपलब्ध नहीं हैं।
विधिक राय में क्या कहा गया
पूरे मामले की केस डायरी का परीक्षण वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों और जिला अभियोजन अधिकारी, बिलासपुर द्वारा किया गया।
विधिक राय में कहा गया कि उपलब्ध साक्ष्यों से यह सिद्ध नहीं होता कि अस्पताल प्रबंधन या चयन समिति ने जानबूझकर, दुर्भावनापूर्ण तरीके से या किसी आपराधिक षड्यंत्र के तहत आरोपी की नियुक्ति की थी। उपलब्ध साक्ष्य उनकी आपराधिक संलिप्तता साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं पाए गए।
पुलिस का अंतिम निष्कर्ष
पुलिस ने अपनी जांच में निष्कर्ष निकाला कि डॉ. नरेन्द्र विक्रमादित्य यादव उर्फ नरेन्द्र जॉन कैम के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार करने, धोखाधड़ी, कूटरचना और अवैध रूप से चिकित्सकीय कार्य करने के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं। इसलिए उसके खिलाफ आपराधिक मुकदमा पूर्ववत जारी रहेगा।
वहीं, अपोलो अस्पताल प्रबंधन, चयन समिति और डॉ. बी.आर. प्रेम कुमार के खिलाफ उपलब्ध दस्तावेजों, गवाहों के बयान और विधिक राय के आधार पर कोई ठोस आपराधिक साक्ष्य नहीं मिलने के कारण पुलिस ने न्यायालय के समक्ष क्लोजर रिपोर्ट प्रस्तुत कर दी है।
गौरतलब है कि क्लोजर रिपोर्ट दाखिल होने के बाद अंतिम निर्णय न्यायालय द्वारा लिया जाएगा। न्यायालय उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर क्लोजर रिपोर्ट स्वीकार करने, आगे की जांच के निर्देश देने अथवा कानून के अनुसार अन्य आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र होगा।

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