1946 का कैबिनेट मिशन प्लान: क्या असम को बांग्लादेश में मिलाने की थी साजिश? पीएम मोदी के बयान से फिर छिड़ी बहस


नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के हालिया बयान के बाद एक बार फिर देश में 1946 के उस ऐतिहासिक घटनाक्रम पर चर्चा तेज हो गई है, जब आज़ादी से ठीक पहले अंग्रेजों ने भारत के भविष्य को लेकर बड़े फैसले लेने की कोशिश की थी। पीएम मोदी ने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, खासकर हिंदुओं पर हो रही हिंसा का ज़िक्र करते हुए असम के इतिहास की ओर इशारा किया और कांग्रेस पर अप्रत्यक्ष रूप से निशाना साधा।

दरअसल, बात उस समय की है जब ब्रिटिश सरकार ने भारत के राजनीतिक भविष्य को तय करने के लिए 1946 में कैबिनेट मिशन को भारत भेजा था। इस मिशन का मकसद भारत की आज़ादी और सत्ता हस्तांतरण की रूपरेखा तैयार करना था। इसी दौरान एक ऐसा प्लान सामने आया, जिसमें असम को मुस्लिम बहुल पूर्वी बंगाल के साथ जोड़कर प्रस्तावित पाकिस्तान में शामिल करने की संभावना पर विचार किया गया।

क्या था 1946 का प्लान?

कैबिनेट मिशन प्लान के तहत भारत को तीन समूहों (ग्रुप A, B और C) में बांटने का प्रस्ताव था।

  • ग्रुप C में असम और बंगाल को शामिल किया गया था।
  • बंगाल मुस्लिम लीग के प्रभाव में था और उसे पाकिस्तान का हिस्सा बनाने की मांग थी।
  • यदि यह योजना पूरी तरह लागू हो जाती, तो असम भी परोक्ष रूप से पूर्वी पाकिस्तान (जो 1971 में बांग्लादेश बना) का हिस्सा बन सकता था।

असम में क्यों हुआ विरोध?

इस योजना के खिलाफ असम में ज़बरदस्त विरोध हुआ।

  • असम के नेताओं और आम लोगों को डर था कि उनकी सांस्कृतिक पहचान, भाषा और अधिकार खत्म हो जाएंगे।
  • गोपीनाथ बोरदोलोई जैसे नेताओं ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया।
  • अंततः असम को बंगाल से अलग रखा गया और वह भारत का अभिन्न हिस्सा बना रहा।

पीएम मोदी का कांग्रेस पर निशाना

प्रधानमंत्री मोदी का आरोप है कि उस दौर में कांग्रेस नेतृत्व ने असम के हितों को लेकर पर्याप्त सख़्ती नहीं दिखाई। उनके मुताबिक, अगर असम के लोगों ने खुद संघर्ष न किया होता, तो राज्य का भविष्य कुछ और हो सकता था।

पीएम मोदी के इस बयान ने इतिहास, राजनीति और विभाजन से जुड़े पुराने सवालों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। समर्थक इसे असम की ऐतिहासिक लड़ाई की याद दिलाने वाला बयान मान रहे हैं, जबकि विपक्ष इसे राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का हिस्सा बता रहा है।

इतिहास के इन पन्नों को पलटने से यह साफ होता है कि 1946 में असम को लेकर बनी साजिशें नाकाम रहीं, लेकिन आज भी उनका ज़िक्र राजनीतिक बहसों में अहम भूमिका निभाता है।

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