पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: पति की सहमति के बिना भी महिला करा सकती है गर्भपात


चंडीगढ़। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने महिलाओं के प्रजनन अधिकारों को लेकर एक ऐतिहासिक और महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि गर्भपात कराने का अधिकार पूरी तरह महिला का है, चाहे वह विवाहित ही क्यों न हो। इस फैसले में कोर्ट ने कहा कि गर्भसमापन के लिए पति की सहमति आवश्यक नहीं है और महिला की इच्छा एवं सहमति ही सर्वोपरि है।

यह फैसला पंजाब की 21 वर्षीय एक विवाहित महिला की याचिका पर सुनाया गया। महिला ने गर्भावस्था की दूसरी तिमाही में गर्भपात की अनुमति मांगी थी। याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि उसकी शादी मई 2025 में हुई थी, लेकिन शादी के बाद से ही पति के साथ उसके संबंध अच्छे नहीं रहे और दोनों के बीच विवाद चल रहा है।

मेडिकल बोर्ड ने दी अनुमति
पिछली सुनवाई में हाईकोर्ट ने पीजीआईएमईआर (स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान), चंडीगढ़ को महिला की चिकित्सकीय जांच के लिए एक मेडिकल बोर्ड गठित करने का निर्देश दिया था। मेडिकल बोर्ड की रिपोर्ट के अनुसार महिला चिकित्सकीय रूप से गर्भपात (एमटीपी) कराने के लिए पूरी तरह फिट है। रिपोर्ट में बताया गया कि महिला के गर्भ में 16 सप्ताह और एक दिन का जीवित भ्रूण है, जिसमें किसी प्रकार की जन्मजात विकृति नहीं पाई गई।

मानसिक स्थिति को भी माना गया अहम
मेडिकल रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि महिला पिछले छह महीनों से अवसाद और चिंता से जूझ रही है। तलाक की कार्यवाही के बीच गर्भावस्था को लेकर वह मानसिक रूप से काफी परेशान है। हालांकि, मेडिकल बोर्ड ने यह स्पष्ट किया कि महिला निर्णय लेने के लिए मानसिक रूप से सक्षम है और उसकी सहमति पूरी तरह वैध है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जस्टिस सुवीर सहगल की अध्यक्षता वाली बेंच ने कहा कि मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रेग्नेंसी (एमटीपी) एक्ट, 1971 में कहीं भी पति की सहमति को अनिवार्य नहीं किया गया है। कोर्ट ने दो टूक कहा कि विवाहित महिला ही यह तय करने की सबसे उपयुक्त व्यक्ति है कि वह गर्भ को आगे बढ़ाना चाहती है या गर्भपात कराना चाहती है।

अदालत ने यह भी कहा कि महिला के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा फैसला उसी का होना चाहिए और उसमें किसी अन्य की सहमति थोपना कानूनन और नैतिक रूप से उचित नहीं है।

महिलाओं के अधिकारों की दिशा में अहम कदम
यह फैसला महिलाओं के आत्मनिर्णय और शारीरिक स्वायत्तता को मजबूत करने वाला माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में एक अहम मिसाल बनेगा और महिलाओं को अपने प्रजनन अधिकारों को लेकर और अधिक सशक्त करेगा।

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