सर्दियों में बकरी के बच्चों की देखभाल: थोड़ी सावधानी, सुरक्षित जीवन और अधिक मुनाफा


हरिभूमि विशेष | पशुपालन मार्गदर्शिका

आज के दौर में बकरी पालन किसानों के लिए स्वरोजगार का एक भरोसेमंद और लाभकारी माध्यम बनता जा रहा है। कम लागत में शुरू होने वाला यह व्यवसाय नियमित आय देता है। लेकिन सर्दियों का मौसम बकरी पालन के लिए सबसे चुनौतीपूर्ण समय माना जाता है, खासकर तब जब बकरी के बच्चे जन्म लेते हैं। नवजात बच्चे ठंड, नमी और संक्रमण के प्रति बेहद संवेदनशील होते हैं। ऐसे में थोड़ी-सी लापरवाही भी उनके जीवन पर भारी पड़ सकती है।

पशु विशेषज्ञों के अनुसार सर्दियों में सही प्रबंधन और समय पर देखभाल से बकरी के बच्चों की मृत्यु दर को काफी हद तक कम किया जा सकता है।


जन्म के तुरंत बाद जरूरी है विशेष ध्यान

सर्दियों में जन्म लेने वाले बकरी बच्चों को सबसे पहले ठंड से बचाना जरूरी होता है। जन्म के समय बच्चे का शरीर गीला होता है, जिससे शरीर की गर्मी तेजी से बाहर निकलती है। इसलिए बच्चे को तुरंत साफ, सूखे और गर्म कपड़े से अच्छी तरह पोंछकर सुखाना चाहिए।

नाभि को काटने के बाद 5 प्रतिशत आयोडीन घोल से साफ करना अनिवार्य है, ताकि संक्रमण का खतरा न रहे। शुरुआती 30 मिनट बच्चे के लिए सबसे संवेदनशील होते हैं, इस दौरान उसे गर्म और सुरक्षित स्थान पर रखना चाहिए।


पहला दूध (कोलोस्ट्रम) है जीवन रक्षक

बकरी के बच्चे के लिए पहला दूध यानी कोलोस्ट्रम किसी अमृत से कम नहीं है। यह प्राकृतिक टीके की तरह काम करता है और बच्चे की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत बनाता है। विशेषज्ञों की सलाह है कि जन्म के पहले एक घंटे के भीतर बच्चे को कोलोस्ट्रम जरूर पिलाया जाए।

पहले 24 घंटे में 3–4 बार यह दूध पिलाने से बच्चा संक्रमण से सुरक्षित रहता है और उसकी बढ़वार बेहतर होती है।


बाड़े की व्यवस्था: ठंड और नमी से सुरक्षा

सर्दियों में बकरी बच्चों की मौत का सबसे बड़ा कारण ठंड और गीला वातावरण है। इसलिए बाड़ा हमेशा साफ, सूखा और हवा से सुरक्षित होना चाहिए। फर्श पर भूसा, पुआल या सूखी घास की मोटी परत बिछाना जरूरी है।

तेज ठंडी हवा रोकने के लिए दरवाजों और खिड़कियों पर बोरी या तिरपाल लगाई जा सकती है, लेकिन थोड़ी हवा की निकासी भी जरूरी होती है। कोहरे और बारिश के दिनों में बाड़ा पूरी तरह बंद रखें और धूप निकलने पर कुछ देर खोलें।


दूध और आहार प्रबंधन पर दें ध्यान

जन्म के बाद शुरुआती 2–3 सप्ताह तक बच्चे का मुख्य आहार मां का दूध होता है। दूध हल्का गुनगुना देना अधिक सुरक्षित माना जाता है। दिन में 3–4 बार थोड़ी मात्रा में दूध पिलाना चाहिए।

15–20 दिन की उम्र के बाद बच्चे को धीरे-धीरे सूखा दाना, मुलायम हरा चारा और साफ पानी देना शुरू करें। दूध पिलाने के बर्तन हमेशा साफ रखें, क्योंकि गंदगी से दस्त का खतरा बढ़ जाता है।


सर्दियों में बढ़ जाता है बीमारी का खतरा

ठंड के मौसम में बकरी बच्चों में निमोनिया और दस्त की शिकायत अधिक देखने को मिलती है। खांसी, नाक बहना, तेज सांस लेना, सुस्ती या बुखार जैसे लक्षण दिखें तो तुरंत सतर्क हो जाएं।

पशुपालकों का कहना है कि साफ-सफाई और ठंडी हवा से बचाव ही रोग नियंत्रण का सबसे कारगर उपाय है। जरूरत पड़ने पर तुरंत पशु चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।


अलग किड पेन से मिलती है सुरक्षा

नवजात बच्चों को बड़े बकरों से अलग रखना चाहिए। इसके लिए एक अलग किड पेन बनाना सबसे सुरक्षित उपाय है। समान उम्र के बच्चों को साथ रखने से वे आपस में गर्मी बनाए रखते हैं और सुरक्षित रहते हैं।

दिन में 1–2 घंटे धूप में रखना बच्चों की सेहत के लिए फायदेमंद होता है।


घरेलू उपाय भी हैं कारगर

ग्रामीण क्षेत्रों में उपलब्ध पुराने ऊनी कपड़े, जूट के बोरे या कंबल बच्चों को ठंड से बचाने में मददगार साबित होते हैं। कार्डबोर्ड बॉक्स में पुआल भरकर बनाया गया अस्थायी गर्म घर भी उपयोगी होता है।


गर्भवती बकरियों की सही देखभाल जरूरी

विशेषज्ञ बताते हैं कि स्वस्थ बच्चे के लिए गर्भवती बकरी की देखभाल सबसे अहम होती है। गर्भावस्था के अंतिम दो महीनों में उसे संतुलित आहार, हरा चारा और साफ पानी देना चाहिए। ठंड से बचाव और आरामदायक माहौल जरूरी है।


टीकाकरण से बीमारी पर नियंत्रण

पीपीआर, एंटरोटॉक्सिमिया और खुरपका-मुंहपका जैसे रोगों से बचाव के लिए समय पर टीकाकरण जरूरी है। साथ ही 1–2 महीने के अंतराल पर कृमिनाशक दवा देने से बच्चों की बढ़वार अच्छी होती है।


निष्कर्ष

सर्दियों में बकरी के बच्चों की देखभाल थोड़ी अतिरिक्त मेहनत मांगती है, लेकिन यही मेहनत आगे चलकर बड़े मुनाफे में बदल जाती है। गर्म और साफ वातावरण, समय पर पहला दूध, संतुलित आहार और नियमित टीकाकरण से बच्चे स्वस्थ रहते हैं। स्वस्थ बच्चे ही भविष्य में किसान की आय का मजबूत आधार बनते हैं।


लेखक
देवेश कुमार गिरी, दीपक कुमार कश्यप,
गोविंदा देवांगन, शैलेश विशाल एवं मो. काशिफ रज़ा
वेटनरी पॉलिटेक्निक
दाऊ श्री वासुदेव चंद्राकर कामधेनु विश्वविद्यालय
दुर्ग (छत्तीसगढ़)


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