नई दिल्ली: भारत में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर एक गंभीर तस्वीर सामने आई है। इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी (IPS) ने चिंता जताई है कि देश में मानसिक बीमारियों से पीड़ित पांच में से चार से अधिक लोगों को समय पर और पर्याप्त इलाज नहीं मिल पाता। इसके चलते लाखों लोग बिना किसी प्रशिक्षित डॉक्टर या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ की देखरेख के बीमारी से जूझ रहे हैं।
राष्ट्रीय सम्मेलन में उठी चिंता
यह मुद्दा राजधानी दिल्ली के यशोभूमि में 28 से 31 जनवरी के बीच आयोजित 77वें राष्ट्रीय साइकियाट्री सम्मेलन के दौरान प्रमुखता से उठाया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि इलाज में प्रगति और मानसिक स्वास्थ्य को लेकर बढ़ती जागरूकता के बावजूद भारत में करीब 80–85% मानसिक रोगी औपचारिक स्वास्थ्य सेवा प्रणाली से बाहर हैं।
इलाज में सबसे बड़ा गैप
राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, सामान्य मानसिक विकारों से पीड़ित 85% से अधिक भारतीय या तो इलाज नहीं कराते या उन्हें इलाज मिल ही नहीं पाता। वैश्विक स्तर पर भी मानसिक बीमारी से जूझ रहे 70% से अधिक लोगों को प्रशिक्षित देखभाल नहीं मिलती, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि भारत की विशाल आबादी और सीमित मानसिक स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा इस समस्या को और गंभीर बना देता है।
सिर्फ मेडिकल नहीं, सामाजिक संकट
इंडियन साइकियाट्रिक सोसाइटी की अध्यक्ष डॉ. सविता मल्होत्रा ने कहा कि यदि मानसिक बीमारी की पहचान समय पर हो जाए, तो अधिकांश मामलों में इसका प्रभावी इलाज संभव है।
उन्होंने कहा,
“यह तथ्य कि 80% से ज्यादा मरीजों को समय पर मनोरोग देखभाल नहीं मिलती, जागरूकता की कमी और प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं में मानसिक स्वास्थ्य के अपर्याप्त एकीकरण को दर्शाता है। यह सिर्फ एक मेडिकल मुद्दा नहीं, बल्कि सामाजिक, आर्थिक और विकासात्मक संकट है।”
आत्महत्या के बढ़ते खतरे की चेतावनी
इंस्टीट्यूट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज के पूर्व निदेशक और आयोजन समिति के अध्यक्ष डॉ. निमेश पी. देसाई ने कहा कि इलाज में देरी के गंभीर परिणाम होते हैं।
उनके अनुसार, देर से इलाज के कारण
- बीमारी पुरानी हो जाती है
- विकलांगता बढ़ती है
- परिवारों पर मानसिक और आर्थिक बोझ पड़ता है
- कार्यक्षमता और उत्पादकता घटती है
- और सबसे चिंताजनक रूप से, आत्महत्या और खुद को नुकसान पहुंचाने का खतरा बढ़ जाता है।
समाधान की जरूरत
विशेषज्ञों ने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं से जोड़ने, प्रशिक्षित पेशेवरों की संख्या बढ़ाने, सामाजिक कलंक को कम करने और समुदाय स्तर पर जागरूकता फैलाने पर जोर दिया है।
भारत जैसे देश में, जहां मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, विशेषज्ञों का मानना है कि समय पर पहचान और इलाज ही लाखों जिंदगियों को बेहतर बना सकता है।

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