लौटा फर्राटा: भारत में चीतों की ऐतिहासिक वापसी

नई दिल्ली भारत की धरती पर सात दशकों बाद एक बार फिर चीते की रफ्तार गूंज रही है। प्रोजेक्ट चीता के तहत दुनिया का पहला अंतर-महाद्वीपीय बड़े मांसाहारी पशु का स्थानांतरण सफलतापूर्वक पूरा हो चुका है। वर्ष 2022-23 के दौरान नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से लाए गए चीतों ने न केवल भारतीय परिस्थितियों में खुद को ढाल लिया है, बल्कि यहां प्रजनन कर नई पीढ़ी को जन्म देकर इस ऐतिहासिक पहल को बड़ी सफलता में बदल दिया है।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 17 सितंबर 2022 को मध्य प्रदेश के कुनो नेशनल पार्क में पहले आठ चीतों को स्वयं जंगल में छोड़कर प्रोजेक्ट चीता की शुरुआत की थी। यह क्षण भारत के वन्यजीव संरक्षण इतिहास में मील का पत्थर साबित हुआ। दिसंबर 2025 तक देश में कुल 30 चीते हो चुके हैं, जिनमें 12 वयस्क, 9 उप-वयस्क और 9 शावक शामिल हैं। खास बात यह है कि इनमें से 19 चीते भारत में ही जन्मे हैं।

भारतीय भूमि पर जन्मी पहली मादा चीता ‘मुखी’ अब खुद पांच स्वस्थ शावकों की मां बन चुकी है, जो इस परियोजना की जैविक सफलता का सशक्त प्रमाण है। कुनो नेशनल पार्क अब केवल पुनर्वास स्थल नहीं, बल्कि एक उभरता हुआ प्राकृतिक चीता परिदृश्य बन गया है।

प्रोजेक्ट चीता का असर केवल वन्यजीव संरक्षण तक सीमित नहीं है। कुनो और आसपास के क्षेत्रों में 450 से अधिक “चीता मित्र” स्थानीय समुदायों को संरक्षण से जोड़ा गया है। इसके साथ ही लगभग 380 लोगों को प्रत्यक्ष रोजगार मिला है और ईको-टूरिज्म से होने वाली आय का 5 प्रतिशत हिस्सा स्थानीय समुदायों के साथ साझा किया जा रहा है। इससे संरक्षण के साथ-साथ आजीविका सशक्तिकरण को भी बढ़ावा मिला है।

सरकार की दीर्घकालिक योजना के अनुसार, वर्ष 2032 तक कुनो-गांधी सागर परिदृश्य में लगभग 17,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 60 से 70 चीतों की एक स्व-संरक्षित मेटापॉपुलेशन विकसित करने का लक्ष्य है। इस दिशा में गांधी सागर वन्यजीव अभ्यारण्य को अगले चरण के लिए तैयार किया जा रहा है।

प्रोजेक्ट चीता न केवल भारत की खोई हुई प्राकृतिक विरासत को पुनर्जीवित करने का प्रयास है, बल्कि यह वैश्विक स्तर पर वन्यजीव संरक्षण, अंतरराष्ट्रीय सहयोग और समुदाय-आधारित विकास का एक अनुकरणीय मॉडल बनकर उभरा है। चीतों की यह वापसी इस बात का प्रतीक है कि यदि सही वैज्ञानिक दृष्टिकोण, राजनीतिक इच्छाशक्ति और जनभागीदारी हो, तो विलुप्त हो चुकी प्रजातियों को भी फिर से जीवन दिया जा सकता है।

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