नई दिल्ली/रायपुर, । विशेष आवश्यकता वाले बच्चों की शिक्षा व्यवस्था को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ सरकार को कड़ी फटकार लगाते हुए विशेष शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया में तेजी लाने के निर्देश दिए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि पात्र अभ्यर्थियों की नियुक्ति प्रक्रिया यथासंभव दो माह के भीतर पूरी की जाए और जुलाई 2026 तक अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।
यह आदेश “राजनीश कुमार पांडेय एवं अन्य बनाम भारत संघ एवं अन्य” मामले की सुनवाई के दौरान पारित किया गया। इस मामले को समावेशी शिक्षा व्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण न्यायिक हस्तक्षेप माना जा रहा है।
याचिकाकर्ताओं की ओर से हुई विस्तृत पैरवी
याचिकाकर्ताओं की ओर से सुप्रीम कोर्ट में एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड कौस्तुभ शुक्ला तथा अधिवक्ता पलाश तिवारी ने विस्तृत पैरवी की।
कौस्तुभ शुक्ला ने छत्तीसगढ़ आरसीआई टीचर एसोसिएशन की ओर से हस्तक्षेप आवेदन भी दायर किया, जिसमें राज्य सरकार पक्षकार है।
राज्य सरकार ने कोर्ट में क्या बताया
सुनवाई के दौरान छत्तीसगढ़ सरकार ने हलफनामे के माध्यम से अदालत को बताया कि राज्य में विशेष शिक्षकों के कुल 848 पद स्वीकृत हैं। इनमें से 100 पदों पर भर्ती के लिए 3 अक्टूबर 2025 को विज्ञापन जारी किया गया था।
सरकार के अनुसार:
- आरसीआई (Rehabilitation Council of India) द्वारा निर्धारित योग्यता रखने वाले 62 विशेष शिक्षकों की नियुक्ति की जा चुकी है।
- शेष 38 पद शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) से संबंधित कारणों के चलते अब भी रिक्त हैं।
155 BRP और 85 विशेष शिक्षकों को राहत
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को यह भी बताया कि:
- प्राथमिक स्तर पर 155 ब्लॉक रिसोर्स पर्सन (BRP) संविदा आधार पर कार्यरत हैं।
- माध्यमिक स्तर पर 85 विशेष शिक्षक निश्चित मानदेय पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
इस पर सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इन सभी 155 BRP और 85 विशेष शिक्षकों को उनके शैक्षणिक एवं व्यावसायिक दस्तावेजों सहित स्क्रीनिंग कमेटी के समक्ष प्रस्तुत होने का अवसर दिया जाए।
अदालत ने कहा कि यदि ये अभ्यर्थी आरसीआई द्वारा निर्धारित योग्यता एवं अन्य आवश्यक पात्रताओं को पूरा करते हैं, तो उनकी नियुक्ति पर विधिसम्मत विचार किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने जताई गंभीर चिंता
अपने आदेश में सुप्रीम Court ने यह महत्वपूर्ण तथ्य भी दर्ज किया कि छत्तीसगढ़ में वर्तमान में 49 हजार से अधिक विशेष आवश्यकता वाले बच्चे हैं, जबकि राज्य को लगभग 3981 विशेष शिक्षकों की आवश्यकता है।
अदालत ने कहा कि समावेशी एवं गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रत्येक बच्चे का अधिकार है और राज्य सरकारों की जिम्मेदारी है कि वे दिव्यांग एवं विशेष आवश्यकता वाले बच्चों के लिए पर्याप्त शिक्षक और संसाधन उपलब्ध कराएं।
समावेशी शिक्षा व्यवस्था को मिलेगा बल
सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश को विशेष आवश्यकता वाले बच्चों और विशेष शिक्षकों के हित में बड़ा फैसला माना जा रहा है। शिक्षा विशेषज्ञों और दिव्यांग अधिकार कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि आदेश का प्रभावी पालन होता है तो राज्य में समावेशी शिक्षा व्यवस्था को मजबूत आधार मिलेगा।
अब इस मामले की अगली सुनवाई और अनुपालन रिपोर्ट जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी।

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