सुप्रीम कोर्ट की मुहर, हाईकोर्ट का फैसला बरकरार
मुंगेली (छत्तीसगढ़) — फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के आधार पर सरकारी नौकरी हासिल करने वाले कर्मचारियों को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है। बहुचर्चित मुंगेली मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही ठहराते हुए उसमें किसी भी तरह के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है।
यह मामला तब सामने आया था जब छत्तीसगढ़ दिव्यांग सेवा संघ ने 27 कर्मचारियों की सूची सार्वजनिक की थी, जिन पर फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र के सहारे सरकारी नौकरी प्राप्त करने का आरोप है। सूची सामने आने के बाद पूरे प्रदेश में मामला चर्चा का विषय बन गया था।
छत्तीसगढ़ दिव्यांग सेवा संघ के प्रदेश अध्यक्ष संतोष टोंडे के अनुसार, सूची में शामिल 27 में से 24 कर्मचारियों ने हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दायर की थी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि हाईकोर्ट का फैसला पूरी तरह न्यायसंगत है और उसमें किसी भी प्रकार के हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि सभी एसएलपी का निपटारा कर दिया गया है और इससे जुड़ी सभी लंबित अंतरिम अर्ज़ियाँ स्वतः समाप्त मानी जाएंगी। इसके साथ ही फर्जी दिव्यांग प्रमाण पत्र धारकों की कानूनी उम्मीदों पर पूरी तरह विराम लग गया है।
असली दिव्यांगों के अधिकारों की बड़ी जीत
इस फैसले को वास्तविक दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक निर्णय माना जा रहा है। लंबे समय से दिव्यांग संगठनों द्वारा यह मांग की जा रही थी कि फर्जी प्रमाण पत्र के माध्यम से नौकरी पाने वालों पर सख्त कार्रवाई हो, ताकि पात्र और जरूरतमंद लोगों को उनका अधिकार मिल सके।
प्रशासनिक कार्रवाई पर उठे सवाल
अब जब सुप्रीम कोर्ट तक से स्थिति पूरी तरह स्पष्ट हो चुकी है, तो प्रशासनिक कार्रवाई में हो रही देरी पर सवाल खड़े होने लगे हैं। दिव्यांग संगठनों का कहना है कि अब किसी प्रकार की कानूनी बाधा शेष नहीं है और दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों पर तत्काल सेवा से बर्खास्तगी सहित कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए।
यह फैसला न केवल मुंगेली बल्कि पूरे प्रदेश में फर्जी प्रमाण पत्रों के खिलाफ एक मजबूत नजीर के रूप में देखा जा रहा है। आने वाले दिनों में प्रशासनिक स्तर पर तेज़ कार्रवाई की संभावना जताई जा रही है।

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