बिलासपुर, छत्तीसगढ़ की न्यायधानी बिलासपुर में शहरी विकास से जुड़ा एक बड़ा घोटाला सामने आया है, जिसने नगर निगम और टाउन एंड कंट्री प्लानिंग (TCP) विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दस्तावेजों की जांच में सामने आया है कि एक आवासीय परियोजना के लिए प्रस्तुत प्रस्ताव और विभाग द्वारा स्वीकृत नक्शे में बड़ा अंतर है, जिससे पूरे अनुमोदन तंत्र की पारदर्शिता पर संदेह पैदा हो गया है।
यह मामला अज्ञया नगर क्षेत्र में प्रस्तावित मेसर्स अनंत रियाल्टी के प्रोजेक्ट से जुड़ा है। दस्तावेजों के अनुसार प्रोजेक्ट के लिए प्रस्तुत एरिया स्टेटमेंट में चार मंजिलों पर केवल 60 फ्लैट बनाने का उल्लेख किया गया था। लेकिन विभाग द्वारा स्वीकृत नक्शे में छह मंजिलों पर 90 फ्लैट दिखाए गए हैं। प्रस्ताव और स्वीकृति के बीच इतना बड़ा अंतर सामान्य प्रशासनिक गलती से अधिक गंभीर अनियमितता की ओर इशारा करता है।
इस मामले में एक और चौंकाने वाला खुलासा उस आर्किटेक्ट के नाम को लेकर हुआ है, जिसके माध्यम से यह नक्शा तैयार किया गया। दस्तावेजों में ‘विकास सिंह’ नाम दर्ज है, लेकिन जांच में पता चला कि बिलासपुर में इस नाम का कोई भी पंजीकृत आर्किटेक्ट या इंजीनियर मौजूद नहीं है। नगर निगम के रिकॉर्ड और पेशेवर संस्थाओं के अनुसार इस नाम से किसी भी व्यक्ति का आधिकारिक पंजीकरण नहीं मिला है।
बताया जा रहा है कि इसी नाम का उपयोग पहले भी कई निर्माण परियोजनाओं के नक्शे पास कराने के लिए किया गया था। संदेह गहराने पर नगर निगम ने इस नाम से जुड़े लाइसेंस को पहले निलंबित और बाद में ब्लैकलिस्ट कर दिया था। इसके बावजूद उसी पहचान के आधार पर कई परियोजनाओं को मंजूरी मिलना विभागीय कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
यह मामला तब और चर्चा में आया जब नगर निगम ने 13 मई को पुराने बस स्टैंड के पास स्थित महुआ होटल में अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई करते हुए बुलडोजर चलाया। जांच में पाया गया कि इस होटल का नक्शा भी ‘विकास सिंह’ के नाम से ही स्वीकृत किया गया था। निर्माण के दौरान स्वीकृत नक्शे की कई शर्तों का उल्लंघन किया गया था, जिसमें ओपन स्पेस और पार्किंग जैसी अनिवार्य सुविधाएं भी शामिल थीं।
इसके बाद नगर निगम ने 24 जुलाई 2025 को इस नाम से जुड़े लाइसेंस को ब्लैकलिस्ट कर दिया। जब इस संबंध में इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ आर्किटेक्ट्स से जानकारी मांगी गई तो उन्होंने भी स्पष्ट किया कि उनके रिकॉर्ड में ‘विकास सिंह’ नाम का कोई पंजीकृत आर्किटेक्ट नहीं है।
जांच के दौरान एक और बड़ा खुलासा हुआ। विभागीय फाइलों की समीक्षा में सामने आया कि शहर में ‘विकास सिंह’ नाम से 400 से अधिक भवनों के नक्शे और 150 से ज्यादा लेआउट स्वीकृत किए जा चुके हैं। यानी एक ऐसे व्यक्ति के नाम पर वर्षों तक निर्माण स्वीकृतियां जारी होती रहीं, जिसका अस्तित्व ही संदिग्ध है।
मामले में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए आवास से जुड़ी अनियमितताओं के भी आरोप लगे हैं। नियमों के अनुसार बड़े आवासीय प्रोजेक्ट में EWS वर्ग के लिए आवास आरक्षित करना अनिवार्य होता है। संबंधित प्रोजेक्ट के लिए बिल्डर ने विभाग को एक शपथपत्र दिया था कि ग्राम तिफरा के खसरा नंबर 407/7 में EWS फ्लैट बनाए जाएंगे।
लेकिन राजस्व रिकॉर्ड की जांच में पता चला कि जिस जमीन का उल्लेख किया गया है, वह जमीन बिल्डर के नाम पर दर्ज ही नहीं है। इससे यह आशंका जताई जा रही है कि विभाग को झूठा शपथपत्र देकर विकास अनुज्ञा प्राप्त की गई।
जांच में यह भी सामने आया कि कुछ मामलों में एक ही दिन में 29 लेआउट फाइलों को मंजूरी दी गई। शहरी नियोजन से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया में इतनी बड़ी संख्या में लेआउट को एक दिन में मंजूरी देना लगभग असंभव है। इससे विभागीय मिलीभगत की आशंका और मजबूत हो जाती है।
यदि इस पूरे मामले के आर्थिक पहलू को देखा जाए तो इसकी गंभीरता और बढ़ जाती है। नगर निगम के अनुमान के अनुसार रिहायशी लेआउट की मंजूरी के लिए प्रति एकड़ लगभग 75 हजार से 2.5 लाख रुपये तक खर्च आता है, जबकि एक सामान्य मकान के नक्शे की स्वीकृति के लिए 8 हजार से 20 हजार रुपये तक शुल्क लिया जाता है। ऐसे में सैकड़ों नक्शे और लेआउट की मंजूरी के साथ करोड़ों रुपये के लेनदेन की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता।
इस पूरे प्रकरण ने बिलासपुर के शहरी विकास तंत्र की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। नागरिकों और सामाजिक संगठनों में भी चिंता बढ़ रही है कि यदि निर्माण स्वीकृति की प्रक्रिया में इतनी बड़ी अनियमितताएं संभव हैं, तो शहर में बन रही इमारतों की वैधानिकता और सुरक्षा भी सवालों के घेरे में आ सकती है।
अब सबकी नजर इस बात पर टिकी है कि क्या इस पूरे मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाएगी। यदि जांच में आरोप सही पाए जाते हैं, तो बिल्डर नमन गोयल और संबंधित विभागीय अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग तेज हो सकती है।
फिलहाल इस खुलासे के बाद बिलासपुर के रियल एस्टेट क्षेत्र और प्रशासनिक तंत्र में हलचल मच गई है। कई लोग मान रहे हैं कि यह मामला केवल एक प्रोजेक्ट तक सीमित नहीं है, बल्कि वर्षों से चल रहे एक बड़े नेटवर्क का संकेत भी हो सकता है।

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