नई दिल्ली। ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में इसकी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और महत्व पर चर्चा की शुरुआत की। इसके साथ ही राज्यसभा में भी मंगलवार से इस मुद्दे पर विस्तृत बहस प्रारंभ हुई। प्रधानमंत्री ने कहा कि यह गीत देश की स्वाधीनता यात्रा और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक रहा है, इसलिए इसके 150 वर्ष पूरे होना ऐतिहासिक क्षण है।
प्रधानमंत्री मोदी ने सदन में कहा, “जब वंदे मातरम के 50 वर्ष हुए तब भारत गुलामी में था, जब 100 वर्ष हुए तब देश आपातकाल की बेड़ियों में जकड़ा था। इसके 150 वर्ष हमें उस गौरव-अध्याय को पुनः स्थापित करने का अवसर देते हैं।” उन्होंने यह भी कहा कि बंकिमचंद्र चटर्जी ने यह गीत 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजी शासन की कठोरता और दमन के दौर में लिखा था।
वंदे मातरम पर सत्ता पक्ष बनाम विपक्ष
वंदे मातरम को लेकर लंबे समय से चला आ रहा विवाद एक बार फिर संसद में सामने आया है। भाजपा ने कांग्रेस पर आरोप लगाया कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कांग्रेस ने गीत के “कुछ महत्वपूर्ण हिस्सों को हटा दिया था।” प्रधानमंत्री मोदी ने 7 नवंबर को इसी संदर्भ में कहा था कि 1937 में “वंदे मातरम की आत्मा के एक हिस्से को काट दिया गया”, जिससे विभाजनकारी राजनीति को बढ़ावा मिला।
इसके जवाब में कांग्रेस ने इसे तथ्यहीन बताते हुए कहा कि निर्णय किसी राजनीतिक दबाव में नहीं, बल्कि रबीन्द्रनाथ टैगोर की सलाह के आधार पर लिया गया था। कांग्रेस नेता जयराम नरेश ने टैगोर के पत्र का उल्लेख करते हुए कहा कि उन्होंने स्वयं सलाह दी थी कि गीत के केवल पहले दो छंद ही सार्वजनिक आयोजनों में लिए जाएं, क्योंकि इनमें किसी धार्मिक प्रतीक का उल्लेख नहीं है।
योगी सरकार का फैसला, विपक्ष का विरोध
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की है कि राज्य के स्कूल, कॉलेज और शिक्षण संस्थानों में ‘वंदे मातरम’ गाना अनिवार्य किया जाएगा। उन्होंने कहा कि “जो वंदे मातरम का विरोध कर रहा है, वह भारत माता का विरोध कर रहा है।”
इस पर समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि संविधान ने किसी भी गीत को अनिवार्य नहीं किया, इसलिए इसे थोपने की कोशिश उचित नहीं है। मुस्लिम समुदाय के कुछ नेताओं ने भी इसे गाने को बाध्य करने का विरोध किया है।
क्या वाकई कुछ हिस्से हटाए गए थे? विवाद की पृष्ठभूमि
‘वंदे मातरम’ 1875 में बंकिमचंद्र चटर्जी द्वारा मूलतः बांग्ला और संस्कृत मिश्रित भाषा में लिखा गया था। बाद में इसे उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ (1885) में शामिल किया गया। गीत में वर्णित प्रकृति-चित्रण बंगाल क्षेत्र से जुड़ा है और इसे कभी ‘बंगाल का राष्ट्रगीत’ भी कहा गया।
1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में यह गीत एक प्रतीक बन गया और स्वतंत्रता संग्राम में हिन्दू-मुस्लिम दोनों समुदायों ने इसे व्यापक रूप से अपनाया। भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु, रामप्रसाद बिस्मिल और अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान जैसे क्रांतिकारियों ने भी इसे अपनी आवाज़ बनाया।
विवाद तब शुरू हुआ जब गीत के बाद के छंदों में देवी दुर्गा के प्रति स्तुति का उल्लेख आया, जिसे कई धार्मिक समुदायों ने असहज बताया। 1937 में कांग्रेस ने रबीन्द्रनाथ टैगोर की सलाह पर एक समिति बनाकर आपत्तियां सुनीं। टैगोर का मत था कि गीत के पहले दो छंद सार्वभौमिक हैं, परंतु आगे के छंद धार्मिक प्रकृति वाले हैं। इसके बाद निर्णय हुआ कि केवल पहले दो छंद आधिकारिक कार्यक्रमों में गाए जाएंगे।
आज की स्थिति
सत्ता पक्ष इसे राष्ट्रभावना और सांस्कृतिक चेतना का प्रतीक बताता है, जबकि विपक्ष गीत को थोपने की राजनीति का आरोप लगाता है। कई दलों का मत है कि संविधान ने ‘जन-गण-मन’ को राष्ट्रगान और ‘वंदे मातरम’ को राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया है, लेकिन इसे अनिवार्य नहीं किया गया।
वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ ने न केवल इसके इतिहास को पुनः चर्चा में ला दिया है, बल्कि केंद्र और राज्यों में राजनीतिक खींचतान को भी और तीखा कर दिया है।
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