रायपुर — छत्तीसगढ़ में धान की खरीदी सिर्फ खेती का मामला नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों की आय, राज्य के वित्त और सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की रीढ़ मानी जाती है। राज्य में धान मुख्य फसल है और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर इसकी खरीदी लाखों किसानों के लिए जीवन रेखा जैसी है। सरकार ने इस प्रक्रिया को पारदर्शी और व्यवस्थित बनाने के लिए टोकन प्रणाली और AgriPortal जैसे डिजिटल उपाय लागू किए हैं, लेकिन जमीनी हकीकत में किसानों को अब भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
कब और कैसे हो रही है धान खरीदी
राज्य में धान खरीदी का सीजन 15 नवंबर 2025 से 31 जनवरी 2026 तक तय किया गया है। इस बार धान का MSP ₹3,100 प्रति क्विंटल रखा गया है। खरीदी के लिए पूरे राज्य में करीब 2,739 खरीदी केंद्र बनाए गए हैं, ताकि किसानों को अपनी फसल बेचने में आसानी हो।
टोकन प्रणाली का मकसद क्या है?
सरकार ने “टोकन तुहर हाथ” नाम से एक मोबाइल ऐप लॉन्च किया है। इसका उद्देश्य यह है कि किसान घर बैठे अपनी फसल बेचने के लिए टोकन ले सकें और तय तारीख व समय पर खरीदी केंद्र पहुंचें। इससे लंबी कतारें खत्म हों, दलाली रुके और पूरी प्रक्रिया पारदर्शी बने।
इस प्रणाली से कुछ हद तक सुधार जरूर हुआ है, लेकिन कई किसानों के लिए यह अब भी परेशानी का कारण बनी हुई है।
डिजिटल सिस्टम में कहां फंस रहा है किसान?
1. कमजोर इंटरनेट और तकनीकी दिक्कतें
ग्रामीण इलाकों में इंटरनेट की समस्या, स्मार्टफोन चलाने में कठिनाई और तकनीकी जानकारी की कमी के कारण कई किसानों को टोकन समय पर नहीं मिल पाता।
2. गिरदावरी पर पूरी निर्भरता
धान खरीदी पूरी तरह पटवारी द्वारा की गई गिरदावरी पर आधारित होती है। इसी रिकॉर्ड के आधार पर AgriPortal तय करता है कि किसान कितना धान बेच सकता है।
समस्या यह है कि कई बार:
- गिरदावरी अपडेट देर से होती है
- खेत या रकबा सही दर्ज नहीं होता
- दस्तावेज समय पर अपलोड नहीं हो पाते
इसका नतीजा यह होता है कि किसान का वास्तविक उत्पादन पोर्टल में कम दिखता है।
21 क्विंटल प्रति एकड़ की सीमा बनी सबसे बड़ी परेशानी
सरकार ने औसतन 21 क्विंटल प्रति एकड़ उत्पादन का मानक तय किया है। लेकिन हकीकत में कई किसान उन्नत बीज, बेहतर सिंचाई और आधुनिक तकनीक से 25 से 35 क्विंटल प्रति एकड़ तक धान पैदा कर रहे हैं।
ऐसे किसान जब खरीदी केंद्र पहुंचते हैं, तो उन्हें पूरे उत्पादन की खरीदी की अनुमति नहीं मिलती। ज्यादा मेहनत और निवेश करने वाले किसान ही इस व्यवस्था में नुकसान उठा रहे हैं। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे “एफिशिएंसी पेनाल्टी” कहा जाता है।
किसानों पर सीधा आर्थिक असर
- पूरा MSP नहीं मिल पाता: अतिरिक्त धान मजबूरी में निजी व्यापारियों को बेचना पड़ता है, जो MSP से 200–300 रुपये कम दाम देते हैं।
- निवेश करने का हौसला टूटता है: ज्यादा उत्पादन करने वाले किसान निराश होते हैं।
- निजी बाजार मजबूत होता है: सरकारी रिकॉर्ड से बाहर धान बिकता है, जिससे PDS और राज्य के स्टॉक अनुमान प्रभावित होते हैं।
- कैश फ्लो की समस्या: पूरी फसल MSP पर न बिकने से अगले सीजन की तैयारी मुश्किल हो जाती है।
टोकन में देरी और लंबी कतारें क्यों?
- खरीदी शुरू होते ही ऐप पर अत्यधिक लोड
- सर्वर क्षमता कम होना
- ग्रामीण क्षेत्रों में नेटवर्क समस्या
- रिकॉर्ड में गड़बड़ी के कारण टोकन सत्यापन में देरी
परिणामस्वरूप खरीदी केंद्रों पर फिर से भीड़, समय की बर्बादी और आर्थिक नुकसान देखने को मिलता है।
प्रशासनिक स्तर पर भी चुनौतियां
- खरीदी केंद्रों की क्षमता का सही अनुमान नहीं
- शिकायत निवारण प्रणाली कमजोर
- डिजिटल डिवाइड के कारण छोटे और बुजुर्ग किसान ज्यादा परेशान
क्या हो सकते हैं समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि व्यवस्था को किसान-केंद्रित बनाया जाए तो हालात सुधर सकते हैं, जैसे:
- वास्तविक उत्पादन पर आधारित टोकन सिस्टम
- खरीदी से पहले रिकॉर्ड सुधार के लिए अलग समय
- ज्यादा उत्पादन वाले किसानों के लिए अतिरिक्त टोकन
- डिजिटल गिरदावरी में फोटो, GPS और टाइम-स्टैम्प का उपयोग
- ऑफलाइन टोकन की सुविधा और मजबूत हेल्पडेस्क
निष्कर्ष
छत्तीसगढ़ की धान खरीदी प्रणाली पहले से ज्यादा पारदर्शी जरूर हुई है, लेकिन 21 क्विंटल प्रति एकड़ की सीमा, गिरदावरी की गलतियां, AgriPortal की सख्त संरचना और टोकन में देरी आज भी किसानों की सबसे बड़ी परेशानी हैं।
अगर यह प्रणाली ज्यादा लचीली, क्षेत्र-विशेष और डेटा आधारित बनाई जाए, तो न सिर्फ किसानों की आय सुरक्षित होगी, बल्कि राज्य की खाद्यान्न नीति और ग्रामीण अर्थव्यवस्था भी और मजबूत होगी ।

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