जनजातीय शौर्य, वंदे मातरम का 118 वर्ष पुराना संकल्प और आत्मबल की अमिट कहानी
नई दिल्ली / रायपुर: 26 जनवरी 2026 को दिल्ली के ऐतिहासिक कर्तव्य पथ पर छत्तीसगढ़ की वह गौरवशाली झांकी प्रस्तुत होगी, जो राज्य के हौसले, शौर्य, बलिदान और जनजातीय आत्मबल की कालजयी कथा को पूरे देश के सामने रखेगी। यह झांकी उस छत्तीसगढ़ की पहचान है जिसने स्वतंत्रता संग्राम में अंग्रेजी हुकूमत की नींव हिला दी थी, जब यह क्षेत्र मध्य प्रांत और बरार का हिस्सा हुआ करता था।
छत्तीसगढ़ की जनजातीय जनता ने जंगल, जमीन और स्वाभिमान की रक्षा के लिए अपने प्राणों की आहुति दी और अंग्रेजों के खिलाफ ऐसे विद्रोह किए, जिन्होंने औपनिवेशिक सत्ता को गहरी चुनौती दी।
देश के पहले जनजातीय डिजिटल संग्रहालय की झलक
इस वर्ष की झांकी का केंद्रबिंदु है शहीद वीर नारायण सिंह स्मारक सह आदिवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी संग्रहालय, जो देश का पहला अत्याधुनिक जनजातीय डिजिटल संग्रहालय है।
इस संग्रहालय का उद्घाटन 1 नवंबर 2025 को छत्तीसगढ़ राज्य स्थापना के 25 वर्ष पूर्ण होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था।
संग्रहालय की 16 गैलरियों में जनजातीय जीवन, लोक संस्कृति, वीर जननायकों और आंदोलनों को वर्चुअल रियलिटी और आधुनिक तकनीक के माध्यम से सजीव रूप में प्रस्तुत किया गया है। यही गौरवगाथा कर्तव्य पथ पर झांकी के रूप में दिखाई देगी।
झांकी में दिखेंगे छत्तीसगढ़ के ऐतिहासिक जनजातीय विद्रोह
छत्तीसगढ़ की झांकी में राज्य के प्रमुख जनजातीय आंदोलनों का चित्रण होगा, जिनमें शामिल हैं—
- हल्बा विद्रोह (1774–1779): भारत का पहला जनजातीय विद्रोह, जिसने स्वतंत्रता चेतना को जन्म दिया।
- सरगुजा विद्रोह (1792): राजा अजीत सिंह के नेतृत्व में स्वराज की भावना का प्रतीक संघर्ष।
- भोपालपट्टनम विद्रोह (1795): बस्तर में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रवेश का सशस्त्र विरोध।
- परलकोट विद्रोह (1824–1825): राजा गेंद सिंह के नेतृत्व में अंग्रेजों और मराठों के खिलाफ वीरता का प्रतीक।
- तारापुर विद्रोह (1842–1854): कर नीति के खिलाफ सफल जन आंदोलन।
- मेरिया विद्रोह (1842): धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए जनजातीय एकजुटता।
- कोया विद्रोह (1859): जंगलों की अंधाधुंध कटाई के खिलाफ प्रतिरोध।
- लिंगा गढ़ विद्रोह (1856): जल-जंगल-जमीन पर अधिकार की लड़ाई।
- सोनाखान विद्रोह (1857): शहीद वीर नारायण सिंह का बलिदान—छत्तीसगढ़ का प्रथम स्वतंत्रता बलिदान।
- रानी-चो-चेरस आंदोलन (1878): जनजातीय महिलाओं के नेतृत्व में सामाजिक स्वाभिमान की रक्षा।
- भूमकाल विद्रोह (1910): वीर गुंडाधुर के नेतृत्व में छत्तीसगढ़ का सबसे बड़ा सशस्त्र आंदोलन।
वंदे मातरम: 118 वर्षों का राष्ट्रभक्ति संकल्प
वर्ष 2026 में वंदे मातरम गीत के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, वहीं छत्तीसगढ़ में इसके गाए जाने के 118 वर्ष पूरे हो रहे हैं।
1907 में रायपुर टाउन हॉल में पहली बार वंदे मातरम गूंजा, जिसने पूरे क्षेत्र में राष्ट्रीय चेतना की ज्वाला प्रज्वलित की।
अंग्रेजों के खिलाफ हर आंदोलन, हर सत्याग्रह में यह नारा गूंजता रहा। इतना प्रभावशाली था कि ब्रिटिश शासन इस गीत से डरने लगा और इसे गाने वालों पर प्रतिबंध लगाने लगा।
गांधीजी और जनजातीय चेतना
1920 में महात्मा गांधी छत्तीसगढ़ आए। कंडेल नहर सत्याग्रह और जंगल सत्याग्रहों के माध्यम से उनके विचार जनजातीय अंचलों तक पहुंचे।
राजनांदगांव के बाजरा टोला में हुए जंगल सत्याग्रह में रामाधार गौड़ वंदे मातरम का जयघोष करते हुए शहीद हो गए। उनके बलिदान ने आंदोलन को और तेज कर दिया।
राष्ट्रीय एकता का संदेश
26 जनवरी 2026 को कर्तव्य पथ पर प्रस्तुत होने वाली छत्तीसगढ़ की झांकी केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि देश की एकता, अखंडता, भाईचारे और बलिदान का जीवंत प्रतीक होगी।
यह झांकी उन वीर जनजातीय सपूतों को नमन है, जिन्होंने अपनी संस्कृति, सभ्यता और मातृभूमि की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया।

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