कैंसर उपचार में नई उम्मीद: ‘बेस एडिटिंग’ तकनीक से लाइलाज ब्लड कैंसर में मिली बड़ी सफलतामरीज़ की भावनाएँ: “मुझे सच में लगा था कि मैं मर जाऊंगी”


लंदन। वैज्ञानिकों ने ब्लड कैंसर के एक बेहद आक्रामक और अक्सर लाइलाज माने जाने वाले रूप के इलाज में बड़ी सफलता हासिल की है। डॉक्टरों का कहना है कि नई जेनेटिक तकनीक ‘बेस एडिटिंग’ ने कई मरीज़ों में टी-सेल एक्यूट लिम्फ़ोब्लास्टिक ल्यूकेमिया को लगभग समाप्त कर दिया है। इस क्रांतिकारी उपचार ने ऐसे मरीजों में जीवन की उम्मीद लौटाई है, जिनके लिए कीमोथेरेपी, बोन मैरो ट्रांसप्लांट और दवाएँ सभी विफल हो चुकी थीं।


पहली मरीज़ एलिसा टैप्ले अब पूरी तरह स्वस्थ

लेस्टर की 16 वर्षीय एलिसा टैप्ले इस तकनीक से इलाज पाने वाली दुनिया की पहली मरीज़ हैं। तीन वर्ष पहले जब उन्हें यह थेरेपी दी गई, तब डॉक्टरों ने उनका पूरा पुराना इम्यून सिस्टम नष्ट करके नया तैयार किया था। गंभीर स्थिति में चार महीने अस्पताल में बिताने वाली एलिसा ने कहा:

“मुझे सच में लगा था कि मैं मर जाऊंगी। मुझे लगा था कि मैं कभी बड़ी नहीं हो पाऊंगी या वे चीज़ें नहीं कर पाऊंगी जिनका हक हर बच्चे को है।”

आज एलिसा पूरी तरह कैंसर-मुक्त हैं और सिर्फ़ सालाना चेकअप की जरूरत होती है। वह अब ए-लेवल पढ़ाई कर रही हैं, ड्राइविंग सीखने की योजना बना रही हैं और भविष्य में बायोमेडिकल साइंस में करियर बनाना चाहती हैं।


क्या है ‘बेस एडिटिंग’ तकनीक?

यूसीएल और ग्रेट ऑरमंड स्ट्रीट हॉस्पिटल की टीम द्वारा विकसित यह तकनीक डीएनए के एक छोटे से हिस्से को सटीक रूप से बदलती है। वैज्ञानिकों ने इसे “जेनेटिक कोड में अक्षर बदलने” जैसा बताया है।

चार बेस – एडेनिन (A), साइटोसिन (C), गुआनिन (G) और थाइमिन (T) – डीएनए की मूल भाषा हैं। इनमें से किसी एक बेस में बदलाव कर वैज्ञानिक टी-सेल्स को कैंसर से लड़ने वाली एक शक्तिशाली ‘जैविक दवा’ में बदल देते हैं।

इस थेरेपी के तहत:

  1. डोनर के स्वस्थ टी-सेल्स लिए जाते हैं
  2. उनका टार्गेटिंग मैकेनिज़्म बदलकर सुरक्षित बनाया जाता है
  3. CD7 नाम के मार्कर को हटाया जाता है
  4. कोशिकाओं को कीमोथेरेपी-प्रतिरोधी बनाया जाता है
  5. और अंत में उन्हें निर्देश दिया जाता है कि वे किसी भी CD7-धारी टी-सेल को नष्ट कर दें, चाहे वह कैंसरग्रस्त हो या स्वस्थ

फिर यह थेरेपी इंजेक्शन के जरिए मरीज को दी जाती है। यदि चार सप्ताह बाद कैंसर का कोई चिन्ह नहीं रहता, तो बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया जाता है ताकि नया इम्यून सिस्टम बन सके।


ट्रायल के नतीजे: 11 में से 7 मरीज पूरी तरह ठीक

न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित रिपोर्ट बताती है कि:

  • कुल 11 मरीजों का इस तकनीक से उपचार हुआ
  • इनमें 8 बच्चे और 2 वयस्क शामिल थे
  • लगभग 64 प्रतिशत मरीजों में कैंसर में भारी कमी आई
  • 9 मरीजों का बाद में बोन मैरो ट्रांसप्लांट किया गया
  • इनमें से 7 मरीज 3 महीने से 3 साल तक पूरी तरह कैंसर-मुक्त हैं

हालाँकि 2 मरीजों में कैंसर कोशिकाओं ने CD7 मार्कर हटाकर इलाज से बचने की कोशिश की और बीमारी वापस लौट आई।


विशेषज्ञों की प्रतिक्रिया: “असाधारण परिणाम”

प्रोफेसर वसीम क़ासिम ने कहा:

“कुछ साल पहले यह तकनीक साइंस फिक्शन जैसी लगती थी। यह बेहद कठिन इलाज है, लेकिन जिनमें काम करता है, उनमें परिणाम चौंकाने वाले हैं।”

ग्रेट ऑरमंड स्ट्रीट के डॉक्टर रॉबर्ट चिएसा के अनुसार:

“इतने आक्रामक ल्यूकेमिया में ऐसे परिणाम बेहद असाधारण हैं। हम उन मरीजों में उम्मीद वापस लाने में सफल हुए हैं जिन्होंने उम्मीद लगभग खो दी थी।”

यूके की स्टेम सेल चैरिटी एंथनी नोलन की डॉक्टर तानिया डेक्सटर ने कहा:

“इन मरीजों के जीवित बचने की संभावना बेहद कम थी। ऐसे में ये नतीजे भविष्य के लिए नई दिशा खोलते हैं।”


निष्कर्ष

‘बेस एडिटिंग’ तकनीक ब्लड कैंसर के उपचार में एक नई क्रांति का संकेत देती है। हालांकि यह प्रक्रिया जटिल और जोखिमपूर्ण है, लेकिन जिन मरीजों पर यह सफल हुई है, उनके लिए यह जीवनदान साबित हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में यह तकनीक और विकसित होगी और अधिक मरीजों तक पहुँच सकेगी।


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