जब कोई अपना लाइलाज बीमारी के दर्द से लगातार तड़पता है, तब दिल और दिमाग दोनों ईश्वर से यही प्रार्थना करते हैं कि उसे इस असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिल जाए। इसी भावनात्मक और मानवीय पीड़ा से इच्छामृत्यु (Euthanasia) का विचार जन्म लेता है। लेकिन भारत जैसे देश में यह सिर्फ भावनाओं का नहीं, बल्कि कानून, नैतिकता और चिकित्सा विज्ञान से जुड़ा बेहद संवेदनशील विषय है।
इच्छामृत्यु क्या है?
इच्छामृत्यु का अर्थ है किसी व्यक्ति की इच्छा या सहमति से उसकी जीवन प्रक्रिया को समाप्त करना, ताकि उसे असहनीय दर्द और कष्ट से राहत मिल सके। इसे मुख्य रूप से दो श्रेणियों में बांटा जाता है—
- सक्रिय इच्छामृत्यु (Active Euthanasia): दवाओं या किसी अन्य माध्यम से जानबूझकर मृत्यु देना।
- निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia): जीवन रक्षक उपचार या सपोर्ट सिस्टम (जैसे वेंटिलेटर) को हटाना।
भारत में इच्छामृत्यु का कानूनी इतिहास
भारत में सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध है और इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) के तहत अपराध माना जाता है। हालांकि, निष्क्रिय इच्छामृत्यु को सीमित शर्तों के साथ वैध माना गया है।
साल 2011 में अरुणा शानबाग केस के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ परिस्थितियों में अनुमति दी। इसके बाद 2018 में ऐतिहासिक फैसला आया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि गंभीर और लाइलाज बीमारी से जूझ रहे मरीज, या कोमा जैसी स्थिति में जीवन रक्षक उपचार हटाया जा सकता है।
भारत में इच्छामृत्यु के दायरे में कौन आते हैं?
भारतीय कानून के अनुसार इच्छामृत्यु का लाभ हर कोई नहीं ले सकता। इसके लिए कुछ सख्त शर्तें हैं—
- मरीज लाइलाज बीमारी से पीड़ित हो
- मरीज स्थायी कोमा या वेजिटेटिव स्टेट में हो
- इलाज से ठीक होने की कोई संभावना न हो
- मरीज या उसके परिजन की लिखित सहमति हो
- अस्पताल की मेडिकल बोर्ड और कानूनी प्रक्रिया की मंजूरी मिले
लिविंग विल और मरीज का अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने लिविंग विल को भी मान्यता दी है। इसमें कोई व्यक्ति पहले से यह लिखित घोषणा कर सकता है कि भविष्य में अगर वह ऐसी हालत में पहुंचे जहां इलाज बेकार हो जाए, तो उसे जीवन रक्षक उपचार न दिया जाए। यह मरीज के सम्मानपूर्वक मृत्यु के अधिकार को मजबूत करता है।
कानूनी और नैतिक पेचीदगियां
इच्छामृत्यु को लेकर सबसे बड़ी चिंता इसका दुरुपयोग है। गरीब, बुजुर्ग या मानसिक रूप से कमजोर लोगों पर दबाव डालकर गलत फैसले लिए जाने का खतरा हमेशा बना रहता है। यही वजह है कि भारत में कानून बेहद सतर्क और जटिल बनाया गया है।
निष्कर्ष
भारत में इच्छामृत्यु भावनात्मक जरूरत और कानूनी सीमाओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास है। जहां एक ओर कानून जीवन की रक्षा को सर्वोपरि मानता है, वहीं दूसरी ओर असहनीय पीड़ा से जूझ रहे मरीज को गरिमा के साथ जीने और मरने का अधिकार भी देता है। यह विषय आज भी समाज, अदालत और चिकित्सा जगत में गंभीर बहस का केंद्र बना हुआ है।

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