भारतीय वैज्ञानिकों ने एक नई रिसर्च में अनुमान लगाया है कि बर्ड फ्लू (H5N1) किस तरह इंसानों में फैल सकता है और कैसे शुरुआती कदम उठाकर एक बड़ी महामारी को रोका जा सकता है। शोध में चेतावनी दी गई है कि अगर शुरुआत में ही सही कार्रवाई न की गई, तो हालात तेजी से नियंत्रण से बाहर हो सकते हैं।
अशोका यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक फिलिप चेरियन और गौतम मेनन द्वारा किए गए इस अध्ययन को BMC पब्लिक हेल्थ जर्नल में प्रकाशित किया गया है। इसमें कंप्यूटर सिमुलेशन के जरिए यह दिखाया गया है कि अगर वायरस पक्षियों से इंसानों में पहुंचता है, तो उसका प्रसार किस तरह हो सकता है।
बर्ड फ्लू को लंबे समय से एक गंभीर वैश्विक खतरे के रूप में देखा जाता रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 2003 से अब तक 25 देशों में H5N1 के करीब 1,000 मानव मामले सामने आए हैं, जिनमें लगभग 48% की मौत हुई है। अमेरिका, भारत और एशिया के कई हिस्सों में हाल के महीनों में पक्षियों और जानवरों में संक्रमण के मामलों ने चिंता और बढ़ा दी है।
इस अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों ने तमिलनाडु के नामक्कल जिले के एक गांव का मॉडल तैयार किया, जो भारत के सबसे बड़े पोल्ट्री क्षेत्रों में से एक है। इस “सिंथेटिक गांव” में घरों, फार्मों, बाजारों, स्कूलों और कार्यस्थलों को शामिल किया गया, ताकि यह समझा जा सके कि वायरस समुदाय में कैसे फैल सकता है।
रिसर्च के मुताबिक, अगर इंसानों में संक्रमण के सिर्फ दो मामले सामने आते ही मरीजों को अलग कर दिया जाए और उनके करीबी संपर्कों के परिवारों को क्वारंटीन कर दिया जाए, तो संक्रमण को लगभग पूरी तरह रोका जा सकता है। लेकिन अगर मामलों की संख्या 10 तक पहुंच जाती है, तो वायरस के व्यापक समुदाय में फैलने की संभावना बहुत ज्यादा हो जाती है।
अध्ययन में यह भी सामने आया कि संक्रमित पक्षियों को मारना (कुलिंग) तभी कारगर है जब वायरस इंसानों तक न पहुंचा हो। एक बार इंसानों में संक्रमण हो जाने के बाद समय सबसे अहम भूमिका निभाता है। देर से उठाए गए कदम संक्रमण को रोकने में नाकाम साबित हो सकते हैं।
वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि लक्षित टीकाकरण संक्रमण के फैलाव को कुछ हद तक रोक सकता है, लेकिन परिवारों के भीतर संक्रमण के खतरे को पूरी तरह कम नहीं कर पाता। क्वारंटीन को लेकर भी दुविधा है—बहुत जल्दी लगाने पर घर के अंदर संक्रमण बढ़ सकता है, और बहुत देर से लगाने पर इसका असर नहीं होता।
अमेरिका की एमोरी यूनिवर्सिटी की वायरोलॉजिस्ट डॉ. सीमा लकदावाला ने कहा कि हर फ्लू वायरस समान रूप से नहीं फैलता। उनके मुताबिक, “सभी संक्रमित लोग वायरस को बराबर मात्रा में नहीं फैलाते,” जिससे वास्तविक हालात सिमुलेशन से अलग हो सकते हैं।
फिर भी वैज्ञानिकों का कहना है कि खतरे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। प्रोफेसर गौतम मेनन ने कहा, “H5N1 के इंसानों में महामारी बनने का खतरा वास्तविक है, लेकिन बेहतर निगरानी और तेज़ सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रतिक्रिया से इसे रोका जा सकता है।”
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर H5N1 इंसानों में स्थापित हो जाता है, तो इसका असर 2009 की स्वाइन फ्लू महामारी जैसा हो सकता है। हालांकि, अगर यह मौसमी फ्लू वायरस के साथ मिल गया, तो भविष्य में गंभीर और अनिश्चित मौसमी महामारियां भी पैदा हो सकती हैं।
शोधकर्ताओं का कहना है कि उनका यह मॉडल भविष्य में वास्तविक समय में इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे किसी भी संभावित प्रकोप की शुरुआती घड़ियों में स्वास्थ्य अधिकारियों को सही और त्वरित फैसले लेने में मदद मिल सकेगी।

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