सरगुजा
सरगुजा जिले में आदिवासी समाज ने अनुसूचित जनजाति आयोग के पूर्व अध्यक्ष भानुप्रताप सिंह पर आदिवासी भाइयों-बहनों के साथ कथित गाली-गलौज और अभद्र भाषा के प्रयोग का आरोप लगाते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया है। आदिवासी नेताओं और ग्रामीणों ने इस घटना को समाज के आत्मसम्मान और गरिमा पर सीधा हमला बताते हुए तीखी निंदा की है तथा भानुप्रताप सिंह से सार्वजनिक माफी की मांग की है।
घटना का विवरण
प्राप्त जानकारी के अनुसार, भानुप्रताप सिंह अपने समर्थकों के साथ राजनीतिक उद्देश्य से साल्ही मोड़ से गांव में प्रवेश करने का प्रयास कर रहे थे। इस दौरान स्थानीय आदिवासी ग्रामीणों ने शांतिपूर्ण तरीके से इसका विरोध किया और उनसे वापस लौटने का आग्रह किया। ग्रामीणों का कहना है कि विरोध पूरी तरह अहिंसक था और संवाद के माध्यम से किया गया।
आदिवासी समाज का आरोप है कि इसी दौरान भानुप्रताप सिंह उत्तेजित हो गए और ग्रामीणों के साथ अभद्र शब्दों व गाली-गलौज का प्रयोग किया, जिससे मौके पर तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई। ग्रामीणों ने कहा कि यह व्यवहार न केवल असंवेदनशील था, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के लिए अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है जो पूर्व में संवैधानिक पद पर रह चुका है।
विरोध रैली और नारेबाजी
घटना के बाद आदिवासी समाज ने विरोध रैली निकाली, जिसमें “भानुप्रताप वापस जाओ” और “बाहरी लोग वापस जाओ” जैसे नारे लगाए गए। समाज के प्रतिनिधियों ने स्पष्ट किया कि यह विरोध किसी राजनीतिक दल के पक्ष या विपक्ष में नहीं, बल्कि अपने गांव, आत्मसम्मान और सामाजिक गरिमा की रक्षा के लिए है।
आदिवासी समाज की प्रतिक्रिया
आदिवासी नेताओं ने कहा कि इस तरह का व्यवहार पूरी तरह अस्वीकार्य है और यह उस मानसिकता को दर्शाता है जिसमें आज भी आदिवासियों से सम्मानजनक संवाद के बजाय दबाव और अपमान की भाषा अपनाई जाती है। समाज ने यह भी कहा कि आदिवासी समुदाय अब पहले से कहीं अधिक जागरूक है और अपने अधिकारों व हितों को लेकर सजग है।
समुदाय के प्रतिनिधियों ने चेतावनी दी कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति द्वारा आदिवासियों के साथ इस प्रकार की भाषा या व्यवहार को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और आवश्यकता पड़ने पर सामाजिक व कानूनी स्तर पर उचित कदम उठाए जाएंगे।
स्पष्ट संदेश
आदिवासी समाज ने दो टूक कहा कि वे किसी भी राजनीतिक एजेंडे या व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा का हिस्सा नहीं बनना चाहते। उनकी प्राथमिकता शिक्षा, रोजगार, विकास और सम्मानजनक जीवन है। समाज का कहना है कि उन्हें आदेश नहीं, संवाद चाहिए; अपमान नहीं, सम्मान चाहिए।
सरगुजा की यह घटना केवल एक व्यक्ति के व्यवहार तक सीमित नहीं, बल्कि उस सोच को उजागर करती है जो आदिवासियों को बराबरी का नागरिक मानने में असफल रहती है। आदिवासी समाज ने स्पष्ट कर दिया है कि आत्मसम्मान से बड़ा कोई मुद्दा नहीं, और जो भी उसे ठेस पहुंचाएगा, उसका विरोध पूरी मजबूती से किया जाएगा।

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